मैं एक वेटेनेरियन का बेटा हूं लिहाजा इसे संयोग ही कहें कि जब सजायाफ़्ता लालू यादव अपने सियासी सूर्यास्त के बाद में जेल में बदली जिंदगी का पहला सूरज देख रहे होंगे,मेरे बड़े भाई हम सारे भाइयों की तरफ से सरयू नदी में स्वर्गीय पिता की श्राद्धतिथि पर उन्हें जलांजलि दे रहे होंगे।
दूसरा संयोग ये है कि अगस्त 1994 में पापा के निधन के ठीक छह महीने पहले फरवरी में मुझे करीब डेढ़ महीने अपनी दिल्ली की पढ़ाई रोककर पटना कैंप करना पड़ा था क्योंकि पिताजी का वेतन बीते सात महीने से बंद था।
वजह बताई कि बगैर एजी ऑफिस के पे स्लिप के सैलरी नहीं मिलेगी, लेकिन एजी स्लिप बिना डायरेक्टर के लेटर के नही मिलेगी जबकि डायरेक्टर लेटर इसलिए नहीं देगा क्योंकि उसके ऑफिस में सर्विस बुक नहीं है।
इधर जिला मुख्यालय रजिस्टर पर हाथ रखकर कसम खा रहा था कि प्रोमोशन के लिए चार साल पहले ही सर्विस बुक डायरेक्टर के पास भेज दी गई है और देखिए रिसिविंग भी आ गई है। पर सबसे बड़ा सवाल था कि
बिना सर्विस-बुक के सर्विस कैसी।
बेक जुलियस सर के दफ्तर के बाहर उनके पीए से मिलना, वहां लेटर इंट्री,रिसीविंग सब किया है मैंने। इस पूरे सिंडिकेट के लीडर हुआ करते थे एसबी सिन्हा, किंगपिन जिनकी मौत हो गई, महेश बाबू अगर कह रहे हैं तो समझिए काम हो गया। मुख्य आरोपी डायरेक्टर रामराज राम जो जेल में ही गुजर गए, उनके बंगले पर सुबह छह बजे ही गया था दो बार और हां, असम हाईवे के बलहा-बीरबन्ना चौक पर डा़ राणा का वो आलीशान बंगला भी बड़े करीब से देखा है,
तब चारा घोटाला उजागर नहीं हुआ था और ये सब अपनी हनक में रहते। सबको मालूम था कि पूरे डिपार्टमेंट पर एक सिंडिकेट का कब्जा है जो सीएम का करीबी है। तब लालू का पशुपालन से लिंक फैमिली बैकग्राउंड के तौर पर माना जाता था, करप्शन के एंगल ने जोड़ नहीं पकड़ा था। हर ऑफिस डे पर मैं पटना कॉलेज हॉस्टल से निकलता और डायरेक्टर,सेक्रेटेरियट और एजी ऑफिस के चक्कर लगाता शाम में लौट आता कोई फायदा नहीं हुआ तो एक ही रास्ता बचा कि बीते तीस सालों में मेरे पिता ने जहां जहां नौकरी की थी उन सब जगहों पर जाकर उनके सर्टिफायड रिकार्ड्स ले आना।
हालांकि सिस्टम के साथ मेरे पिता की ये कोई पहली भिड़ंत नहीं थी, पर तब मैं माइनर था और इसबार उनके अस्वस्थ होने के नाते कमान मेरे हाथ में थी, मैं सारी चीजों को देख और समझ रहा था।
मोटे तौर पर मैं कह सकता हूं कि बिहार के पशुपालन को टॉप टू बॉटम देखा है। पहला खिलौना सीरिंज बनी,पानी भर कर फेंकने में,धीरे धीरे सारे औजारों से करीबी बढ़ी। मैं इलाज के तौर तरीके संजीदगी से देखता और दावे के साथ कह सकता हूं कि एक क्वैक से ज्यादा जानकारी रखता हूं,मुखर्जीनगर के इलाके में कई गायों को कैल्शियम चढ़ाकर खड़ा कर चुका हूं, एक दो प्लास्टर भी किए हैं।
बचनपन में मुझे याद है जब दवाएं छोटेवाले ट्रक से सप्लाई होती थी। डिस्पेंशरी एक कमरे की थी तो सबकुछ घर में उतरता और करप्शन के नाम पर यही होता कि कॉलोनी के किसी घर से फिनाइल और डेटॉल की डिमांड आती तो मैं डिलीवरी ब्वॉय बनकर दे आता और मेरी गाय या भैंस का इलाज सरकारी दवाओं से होता। लेकिन उन आखिरी सालों में वाकई सबकुछ सूख गया था, ज्यादा से ज्यादा महामारी के टाइम में वैक्सीन आ गई वही बहुत है।
किसी को कोई लेना देना नहीं, पशुपालन को बिहार में आमतौर पर गोबर डिपार्टमेंट कह कर अनदेखी की जाती थी और उसके डॉक्टर देहातों में बड़े प्यार से घोड़ा डॉक्टर कहे जाते। और रही बात डॉक्टरों की तो ज्यादातर कुंठित थे उन्हें छोड़कर जो चालू थे। क्योंकि पैसा खाने का हर स्तर पर जुगाड़ था। अगर आप चलता पुर्जा नहीं है,फर्जी पोस्टमार्टम और फिटनेस सर्टीफिकेट देकर कोई समझौता नहीं करते तो पड़े रहिए जहां पड़े हैं। तीस साल की नौकरी में एक ही पोस्ट पर काम करने की पिता की कुंठा सिर्फ इस बात से शांत होती कि उनके दो तीन साल सीनियरों का भी नहीं हुआ है। ये बात जुमला बन गई थी कि वेटेनरी कंगाल हो गया है।
मेरी परवरिश वेटेनरी के पैसे से हुई है, आज कोर्ट ने उनलोगों को सज़ा दी है जिसने इसे कंगाल किया था।
अभी मैने ये फैसला नहीं किया है कि इस बात का दावा करुं या ना करुं कि दोषियों ने मेरा भी हक़ मारा है।
दूसरा संयोग ये है कि अगस्त 1994 में पापा के निधन के ठीक छह महीने पहले फरवरी में मुझे करीब डेढ़ महीने अपनी दिल्ली की पढ़ाई रोककर पटना कैंप करना पड़ा था क्योंकि पिताजी का वेतन बीते सात महीने से बंद था।
वजह बताई कि बगैर एजी ऑफिस के पे स्लिप के सैलरी नहीं मिलेगी, लेकिन एजी स्लिप बिना डायरेक्टर के लेटर के नही मिलेगी जबकि डायरेक्टर लेटर इसलिए नहीं देगा क्योंकि उसके ऑफिस में सर्विस बुक नहीं है।
इधर जिला मुख्यालय रजिस्टर पर हाथ रखकर कसम खा रहा था कि प्रोमोशन के लिए चार साल पहले ही सर्विस बुक डायरेक्टर के पास भेज दी गई है और देखिए रिसिविंग भी आ गई है। पर सबसे बड़ा सवाल था कि
बिना सर्विस-बुक के सर्विस कैसी।
बेक जुलियस सर के दफ्तर के बाहर उनके पीए से मिलना, वहां लेटर इंट्री,रिसीविंग सब किया है मैंने। इस पूरे सिंडिकेट के लीडर हुआ करते थे एसबी सिन्हा, किंगपिन जिनकी मौत हो गई, महेश बाबू अगर कह रहे हैं तो समझिए काम हो गया। मुख्य आरोपी डायरेक्टर रामराज राम जो जेल में ही गुजर गए, उनके बंगले पर सुबह छह बजे ही गया था दो बार और हां, असम हाईवे के बलहा-बीरबन्ना चौक पर डा़ राणा का वो आलीशान बंगला भी बड़े करीब से देखा है,
तब चारा घोटाला उजागर नहीं हुआ था और ये सब अपनी हनक में रहते। सबको मालूम था कि पूरे डिपार्टमेंट पर एक सिंडिकेट का कब्जा है जो सीएम का करीबी है। तब लालू का पशुपालन से लिंक फैमिली बैकग्राउंड के तौर पर माना जाता था, करप्शन के एंगल ने जोड़ नहीं पकड़ा था। हर ऑफिस डे पर मैं पटना कॉलेज हॉस्टल से निकलता और डायरेक्टर,सेक्रेटेरियट और एजी ऑफिस के चक्कर लगाता शाम में लौट आता कोई फायदा नहीं हुआ तो एक ही रास्ता बचा कि बीते तीस सालों में मेरे पिता ने जहां जहां नौकरी की थी उन सब जगहों पर जाकर उनके सर्टिफायड रिकार्ड्स ले आना।
हालांकि सिस्टम के साथ मेरे पिता की ये कोई पहली भिड़ंत नहीं थी, पर तब मैं माइनर था और इसबार उनके अस्वस्थ होने के नाते कमान मेरे हाथ में थी, मैं सारी चीजों को देख और समझ रहा था।
मोटे तौर पर मैं कह सकता हूं कि बिहार के पशुपालन को टॉप टू बॉटम देखा है। पहला खिलौना सीरिंज बनी,पानी भर कर फेंकने में,धीरे धीरे सारे औजारों से करीबी बढ़ी। मैं इलाज के तौर तरीके संजीदगी से देखता और दावे के साथ कह सकता हूं कि एक क्वैक से ज्यादा जानकारी रखता हूं,मुखर्जीनगर के इलाके में कई गायों को कैल्शियम चढ़ाकर खड़ा कर चुका हूं, एक दो प्लास्टर भी किए हैं।
बचनपन में मुझे याद है जब दवाएं छोटेवाले ट्रक से सप्लाई होती थी। डिस्पेंशरी एक कमरे की थी तो सबकुछ घर में उतरता और करप्शन के नाम पर यही होता कि कॉलोनी के किसी घर से फिनाइल और डेटॉल की डिमांड आती तो मैं डिलीवरी ब्वॉय बनकर दे आता और मेरी गाय या भैंस का इलाज सरकारी दवाओं से होता। लेकिन उन आखिरी सालों में वाकई सबकुछ सूख गया था, ज्यादा से ज्यादा महामारी के टाइम में वैक्सीन आ गई वही बहुत है।
किसी को कोई लेना देना नहीं, पशुपालन को बिहार में आमतौर पर गोबर डिपार्टमेंट कह कर अनदेखी की जाती थी और उसके डॉक्टर देहातों में बड़े प्यार से घोड़ा डॉक्टर कहे जाते। और रही बात डॉक्टरों की तो ज्यादातर कुंठित थे उन्हें छोड़कर जो चालू थे। क्योंकि पैसा खाने का हर स्तर पर जुगाड़ था। अगर आप चलता पुर्जा नहीं है,फर्जी पोस्टमार्टम और फिटनेस सर्टीफिकेट देकर कोई समझौता नहीं करते तो पड़े रहिए जहां पड़े हैं। तीस साल की नौकरी में एक ही पोस्ट पर काम करने की पिता की कुंठा सिर्फ इस बात से शांत होती कि उनके दो तीन साल सीनियरों का भी नहीं हुआ है। ये बात जुमला बन गई थी कि वेटेनरी कंगाल हो गया है।
मेरी परवरिश वेटेनरी के पैसे से हुई है, आज कोर्ट ने उनलोगों को सज़ा दी है जिसने इसे कंगाल किया था।
अभी मैने ये फैसला नहीं किया है कि इस बात का दावा करुं या ना करुं कि दोषियों ने मेरा भी हक़ मारा है।
दीपक जी , आप कलम के आदमी हैं , बिलकुल कलमिया देते हैं , मतलब कि ऐसी चोट कि जबर भी लगे , और उफ़ भी न होने दे , और सोने पे सुहागा तो तब , जब आप अपनी स्मृतियों की चादर बुनते हैं!
जवाब देंहटाएंआभार!
You said above 'महेश बाबू अगर कह रहे हैं तो समझिए काम हो गया'. If you remember, you visited BIT Mesra while expediting the uncle's matter. When you came in my hostel's mess for the first time, Mahesh babu's son (very close friend of mine) was sitting beside me. I didn't know that ur matter could be solved by Mahesh babu. Pata rahta to shayad tumko itna bhangna nahi parta.... Anyways struggle has always been part & parcel of your life.........Bahut achha likh rahe ho....Good luck.
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