सोमवार, 16 सितंबर 2013

लाल बाबू

  लाल बाबू गजब हैं,फॉटी प्लस के गबरु जवान। इतना एनर्जेटिक की दुनिया पनाह मांगती। हर घाट का पानी पी चुके लाल बाबू ने जमाने को पानी पिलाने का कोटा ले रखा था। 22-24 साल के लौंडे रहे होंगे, जब नसबंदी हुई। ट्रेन पर मुफत में लदकर गांव से सनीमा देखने शहर आ रहे थे। रास्ते में प्रारब्ध उनके मस्तक पर राख मलने को तैयार बैठा था। जालिमों ने बाकायदा जाल बिछाया, पुलकित प्रफुल्लित टोली ने अभी गाने डॉयलॉग का रियाज शुरू ही किया था कि सरयू नदी के मील भर लंबे मांझी पुल पर ट्रेन ठस्स करके रुक गई। 
   दोनों तरफ पुलिसिए यमदूत बने खड़े थे, एकदम फाउल गेम। भाई साहब, जहां भागने की कहीं जगह ही ना हो, वहां रेस कैसे लग सकती है और ऐसे में बेन जॉनसन ही क्या कर लेते। सबने सरेंडर किया, बेटिकट पकड़ लिए गए। बकौल लाल बाबू उन्हें बकायदा मजिस्ट्रेट के सामने पेश भी किया गया, लेकिन वो बिलकुल नहीं डरे। इसके पहले जवानी के जोश में सिपाहियों को गरिया ही चुके थे। पता नहीं किसने किससे और कैसे खुंदक निकाली, इमरजेंसी में पब्लिक रुल इतना टाइट था कि सजा या चेतावनी के तौर पर सरकार उनके निजी सेक्टर का कनेक्शन काटने में सफल रही।
गजब हो गया, हर तरफ हाहाकार मच गया, अंधियारा छा गया। तीन भाइयों के बीच के इकलौते चिराग लाल बाबू की नसबंदी हो गई। उस शाम गांव में चूल्हा नहीं जला, वैसे भी दो तिहाई घरों में एक ही शाम चूल्हा जलता। टोले मोहल्ले की महिलाएं छाती पीटती आंसू पोंछने आती और हांफते हुए वापस जाती। लाल बाबू के एमए पास विचारशील ताउ ने भी हताशा और निराशा में अनुलोम विलोम करते हुए कहा था...
   सिस्टम ने एक लाइफ तबाह कर दी
लाल बाबू के घराने पर गांव को नाज था और घराने को उनपर। घरवाले हारे नहीं, उन्हें लेकर फौरन शहर के बड़े अस्पताल पहुंचे, जहां ऑपरेशन थियेटर में दो एक छोटे-बड़े ऑपरेशन कर डॉक्टरों ने डैमेज कंट्रोल कर लिया लेकिन पूरे जवार भर में ये ज्यादती जंगल की आग बनकर फैल गई। घरवाले दूसरों के दलान पर ताल ठोक ठोक कर उनकी ताकत वापसी की कहानियां सुनाते, डॉक्टरों की काबलियत की दाद देते। पर हादसे की अनहोनी  लोगों के दिलोदिमाग पर  पत्थर की लकीर बन चुकी थी जिसमें फेरबदल की बहुत गुंजाइश नहीं होती।कोई मानता भी तो किंतु परंतु या अगर मगर का उपसर्ग प्रत्यय लगा ही देता।  हंसी मजाक में ही हवा उनके खिलाफ हो गई और मौजूदा सच रहस्य बन गया। विवाह के कई रिश्ते सिल्की अहसास कराते हुए सर्र से निकल गए। दरअसल अब उनका काम सिर्फ किसी योग्य कन्या से नहीं चलता। कोई भी मां-बाप अपनी बेटी का कैरेक्टर सर्टिफिकेट उनके पोटेंसी टेस्ट की रिपोर्ट के साथ अटैच करने का रिस्क क्यों उठाता। धीरे धीरे उम्र भी निकल गई।
   समाज के आईने में लाल बाबू जबकभी अपनी इमेज खंगालते तो छुट्टे सांढ़ या आवारा बैल की मिली जुली धुंधली तस्वीर उभरती। लाल बाबू ने पब्लिक प्रोपगंडा का दंश खुद पर झेला था, लिहाजा वो इस कला में मास्टर हो गए।

    77 के चुनावों में उन्होंने जमकर हिस्सा लिया। जख्म हरे थे,इसलिए पूरा खानदान इंदिरा शासन को उखाड़ फेंकना चाहता था। इतनी ललक तो कभी राजनारायण को भी शायद नहीं रही हो। इलाके में कहते हैं कि जिस दिन राजनारायण विंध्याचल में मुंडन करा रहे थे उस दिन लाल बाबू ने नाई बुलाकर दुआर पर बाल मुंड़वाए थे। मोरारजी के शपथ ग्रहण वाले दिन सत्यनारायण की पूजा हुई। शाम को दिए भी जले होते लेकिन बारह रुपए सरसों तेल का नारा लगाने के बाद किसी को हिम्मत नहीं हुई। 

रविवार, 15 सितंबर 2013

आत्म परिचय

अपना परिचय देना मेरे हिसाब से सबसे मुश्किल काम है। एक आत्मग्लानि का भाव रहता है कि अभीतक कोई कायदे की चीज सीख नहीं पाया हूं,एक खोज में लगा हूं कि इंसान की काबलियत नापने का तरीका और उसका यूनिट कहीं से मिल जाए। मुझे इस बात का बड़ा कंफ्यूजन रहा है कि मैंने दुनिया देखी है और उसे समझता हूं, कितना सही कितना गलत इसका कोई थर्मामीटर नहीं है। इस ब्ल़ॉग के जरिए मैं अपने अनुभवों को बांटना चाहूंगा,तथ्यात्मक तौर पर सही रहूंगा, पर बातें दो तरह की होती हैं देखी और सुनी, पहली का तो आप ठेका ले सकते हैं सुनने का सबूत कहां से लाएं।
     मै कोई प्रेमचंद या श्रीलाल शुक्ल नहीं लिहाजा किश्तों में भांति भांति के अनुभवों और किरदारों से मिलाने की कोशिश होगी। फुर्सत की जिंदगी में चौपाल बेहद अहम चीज है जहां दो रुपए की चाय के साथ देश और समाज की राजनीति पर घंटो परिचर्चा होती है, कतिपय कारणों से मेरा इन बातों से बड़ा करीबी रिश्ता रहा है.. आगे पसंद या नापसंद आपलोगों पर टिकी है। इससे पहले विचारधारा के तौर पर बता दूं सिवाय पिता के किसी से भी प्रभावित नहीं हुआ। जिन्होंने कहा था कि सबकी फिलॉसफी जाननी और समझनी चाहिए लेकिन उससे प्रभावित होने का कोई मतलब नहीं बनता। ये नहीं कि फ्रायड की किताब पढ़ी तो उसके चेले बन गए या फिर संभोग से समाधि पढ़कर ओशो का गुण गाने लगे, गेरुआ पहनकर संन्यासी हो गए, किसी दिन उठो अपना धर्म बदल लो, अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। राजनीतिक तौर पर कई दुविधाओं से ग्रस्त हूं। खानदानी कांग्रेसी होकर भी कांग्रेस से घोर घृणा करता हूं,जो पूरे देश को दीमक की तरह चाट गई। संघी नहीं हो सकता क्योंकि राष्ट्रवाद लुभाता तो है लेकिन एक लकीर खींचकर ये नहीं कह सकता कि ये राष्ट्रभक्ति का लाइसेंस सिर्फ एक ही समुदाय को मिल सकता है या फिर गांधीवध को दलीलों के दम पर प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जायज ठहराया जा सकता है। वामपंथ के काबिलों की इज्जत करता हूं लेकिन वो टैलेंट किस काम का जो सिर्फ विध्वंस करे। इनकी कोई भी बात व्यावहारिक नहीं लगती। कुल मिलाकर एक आम आदमी हूं जिसकी कोई पार्टी नहीं।वोट देने के अलावा अगर कभी चुनना होगा तो पार्टी की बजाय देशहित के साथ हूं। इस लिहाज से अगर आज के मौजूदा माहौल की बात करें तो
ना मोदी, ना राहुल ना केजरीवाल
मेरा नेता अजीत डोभाल