सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

सामाजिक न्याय

बीस साल पहले रायजी बस स्टैंड पर एजेंटी करते थे, पहले सिर्फ सवारी बैठाते, लेकिन जब लालू मुख्यमंत्री बने तो रैली के लिए लोग भी भेजने लगे।  देह हाथ के तगड़े थे ही, किसी की मां-बहन करने के लिए वार्म अप होने की जरुरत नहीं थी। जुबान से कोई वाक्य लूज नहीं निकलता, गालियां आगे-पीछे से टाइट किए रहती।  समकालीन पॉलिटिक्स में इस तरह के टैलेंट कैंपस सेलेक्शन में ही उठ जाते है और नहीं तो क्या.. आपको क्या लगता है शहाबुदीन,आनंद मोहन,पप्पू यादव और ऐसे दर्जनों कमांडो पॉलिटिक्स में क्या पैराशूट लेकर कूदे थे।
 काम के हिसाब से तरक्की मिली तो दस साल में जिला परिषद के अध्यक्ष हो गए। माशाअल्लाह किस्मत ऐसी चमकी कि डीएम-एसपी वाले जिस रोड पर कभी इमरजेंसी में भी ट्रैफिक वाला कोच नहीं घुसाने देता था, उसी के मेन चौराहे पर कॉर्नर का बंगला जिसमें डीडीसी रहते थे, उसे खाली करवा कर अपने नाम करवाया।
    सामाजिक न्याय के बदौलत हुए इस परिवर्तन का असर गृह प्रवेश के पहले से ही दिखने लगा, पूरे शहर के दर्जनों डिश एंटिना रातोंरात उनकी छत पर आ गए,कैंपस में कंट्रोल रूम खुल गया। शाम होते ही बाउंड्री के बाहर बस स्टैंड का नजारा होता, उन दिनों देर रात टीवी सिक्स देखने का रिवाज था,वहां आने वाले मेहमानों को भी रात में लौटने की जल्दी नहीं होती।
 पूरे शहर में उनकी चलती है, पहले सिर्फ बसों से तसीलते थे और अब किससे नहीं वसूलते हैं।
            लेकिन संजय राय उतने लकी नहीं रहे,
   बाबू जी फोर्थ ग्रेड स्टाफ थे और वो खुद बाहुबल पर ओवरसीयर,इंजीनियर से सेटिंग कर छोटे मोटे ठेके हथिया लेते, जल्द ही उनको लगा कि लोकप्रिय हो गए है, लोग नेताजी पुकारने लगे, टिकट के लिए ट्राई मारी पर जब ट्रेन में नहीं मिलता है तो यहां विधायकी का कहां से मिलता।  इसी बीच बाबू जी रिटायर हो गए, नोट आया तो कॉन्फिडेंस साथ लाया, जिसके बाद  पूरी पब्लिक के सामने पहले निर्दलीय फिर हालात के सामने नंगे होकर खड़े हो गए।
 पर ऐसा भी नहीं कि सामाजिक न्याय राय बंधुओं से पहले नहीं था लेकिन तब मैं नहीं था लिहाजा देखी और समझी नहीं सिर्फ सुनी सुनाई बातें याद हैं। जैसे मिसिर जी कॉलेज में पढ़ने के नाम पर हॉस्टल में रहते लेकिन रोड पर मोटरसाइकिल छीनने का काम करते थे लेकिन कांग्रेस की लहर ने सब किए धरे पर पानी फेर दिया। जाति समीकरण में फिट उतरे तो नौजवान के नाम पर टिकट जुगाड़ लिए फिर मंत्री तक बने, जब तक उनका राज चला, उनके एक भाई जमाने के सर पर पेट्रोल विसर्जन करते रहे। वो कुंभकरण की तर्ज पर पांच साल में सिर्फ एक दिन अपने अग्रज को सेवा देते, चुनाव वाले दिन बूथ कैप्चरिंग ब्रिग्रेड का कमांडर बनकर।
     बिहार में अलग अलग जातियां अपने अपने वक़्त में सामाजिक न्याय के परचम गाड़ती रही हैं, पर सवाल है कि क्या इसे ही न्याय माना जाए। मुझे लगता है न्याय का मतलब है कि जाति,तबका,सियासत,प्रशासन या फिर मजहब, इसका कंट्रोल हर हाल में इसके बेहतरीन लोगों के पास होना चाहिए और किसी कारणवश उनकी कमी हो तो एक ऐसी मशीनरी और सिस्टम पैदा करे ताकि अच्छे लोग पैदा हो सके। वैसे लालू की बिरादरी की हालत बिहार में इतनी भी दबी कुचली नहीं जितना वो दिखाते हैं। एक से एक काबिल और बुद्धिजीवी थोक के भाव हैं, चाहे वो कोई भी फील्ड हो। लालू ने उनकी मदद क्यों नहीं ली।  गांवो में बहुसंख्यक पिछड़ेपन की बात सही है और उस स्तर पर पकड़ रखते हुए भी लालू ने उनके लिए कुछ नहीं किया, लालू लोगों की सोच बदल सकते थे। लालू के हाथों में उतनी ताकत थी कि चुटकी मसलते ही सबकुछ टाइट कर देते लेकिन उन्होंने सबकुछ खुला छोड़ दिया,अफसोस मौका गंवाने का है अब इंतजार कीजिए कि  बिहार को उतना पावरफुल मास लीडर कब मिलता है।  तबतक
  

1 टिप्पणी:

  1. कोई जवाब नहीं भैया ... बहुत हीं बेहतरीन तरीके से धो डाला आपने ... बहुत बढ़िया .. सर्फ़ एक्सेल फेल है आपकी धुलाई के सामने (Y)

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