रविवार, 15 सितंबर 2013

आत्म परिचय

अपना परिचय देना मेरे हिसाब से सबसे मुश्किल काम है। एक आत्मग्लानि का भाव रहता है कि अभीतक कोई कायदे की चीज सीख नहीं पाया हूं,एक खोज में लगा हूं कि इंसान की काबलियत नापने का तरीका और उसका यूनिट कहीं से मिल जाए। मुझे इस बात का बड़ा कंफ्यूजन रहा है कि मैंने दुनिया देखी है और उसे समझता हूं, कितना सही कितना गलत इसका कोई थर्मामीटर नहीं है। इस ब्ल़ॉग के जरिए मैं अपने अनुभवों को बांटना चाहूंगा,तथ्यात्मक तौर पर सही रहूंगा, पर बातें दो तरह की होती हैं देखी और सुनी, पहली का तो आप ठेका ले सकते हैं सुनने का सबूत कहां से लाएं।
     मै कोई प्रेमचंद या श्रीलाल शुक्ल नहीं लिहाजा किश्तों में भांति भांति के अनुभवों और किरदारों से मिलाने की कोशिश होगी। फुर्सत की जिंदगी में चौपाल बेहद अहम चीज है जहां दो रुपए की चाय के साथ देश और समाज की राजनीति पर घंटो परिचर्चा होती है, कतिपय कारणों से मेरा इन बातों से बड़ा करीबी रिश्ता रहा है.. आगे पसंद या नापसंद आपलोगों पर टिकी है। इससे पहले विचारधारा के तौर पर बता दूं सिवाय पिता के किसी से भी प्रभावित नहीं हुआ। जिन्होंने कहा था कि सबकी फिलॉसफी जाननी और समझनी चाहिए लेकिन उससे प्रभावित होने का कोई मतलब नहीं बनता। ये नहीं कि फ्रायड की किताब पढ़ी तो उसके चेले बन गए या फिर संभोग से समाधि पढ़कर ओशो का गुण गाने लगे, गेरुआ पहनकर संन्यासी हो गए, किसी दिन उठो अपना धर्म बदल लो, अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। राजनीतिक तौर पर कई दुविधाओं से ग्रस्त हूं। खानदानी कांग्रेसी होकर भी कांग्रेस से घोर घृणा करता हूं,जो पूरे देश को दीमक की तरह चाट गई। संघी नहीं हो सकता क्योंकि राष्ट्रवाद लुभाता तो है लेकिन एक लकीर खींचकर ये नहीं कह सकता कि ये राष्ट्रभक्ति का लाइसेंस सिर्फ एक ही समुदाय को मिल सकता है या फिर गांधीवध को दलीलों के दम पर प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जायज ठहराया जा सकता है। वामपंथ के काबिलों की इज्जत करता हूं लेकिन वो टैलेंट किस काम का जो सिर्फ विध्वंस करे। इनकी कोई भी बात व्यावहारिक नहीं लगती। कुल मिलाकर एक आम आदमी हूं जिसकी कोई पार्टी नहीं।वोट देने के अलावा अगर कभी चुनना होगा तो पार्टी की बजाय देशहित के साथ हूं। इस लिहाज से अगर आज के मौजूदा माहौल की बात करें तो
ना मोदी, ना राहुल ना केजरीवाल
मेरा नेता अजीत डोभाल

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